ना भूलना


शहर बदला पर ज्जबात ना बदलना
राहें जुदा हुई पर वो मोड मत भूलना
नया सफर जरूर शुरु करना
पर पुराना अफसाना साथ लेकर चलना

कहानी


यहा हर कोई अपनी कहानी सुनाने को बेताब
और दुसरे की बारी आई तो वक्त नही जनाब
कभी किसी और की कहानी के लिए भी कुछ पल गवाए
पता नही कौनसी कहानी कल अपने हिस्से आ जाए

जिस पल मिला था तू


पता नही हादसा था या यकीन
पर वो लम्हा था बेहद हसीन
जिस पल मिला था तू

पता नही सैलाब था या मेरा साहिल
पर अजब थी दिल की मुश्किल
जिस पल मिला था तू

पता नही ठहराव था या एक जुनून
पर रुह को हासील हुआ कुछ सुकून
जिस पल मिला था तू

पता नही मंजिल था या मेरी तबाही
पर उस आवारगी को थी दिल की ग्वाही
जिस पल मिला था तू

पता नही सच्च था या एक ख्वाब
पर वो एहसास था लाजवाब
जिस पल मिला था तू

पता नही जख्म था या मरहम
पर खूबसूरत था दिल का आलम
जिस पल मिला था तू

वो पल जहन में आज भी ताजा है
जिस पल मिला था तू
जिस पल मिला था तू
जिस पल मिला था तू

A promise


Fed up of day, fed up of night,

Everyday same story or the same plight

Best of assurances I give my life,

And make it believe, its worthwhile

But then monotony creeps in and spirits do die,

Me sitting in the corner of room wondering why

Boundaries I set but with time I fail to redefine,

And do get stuck in the melancholy of mine

Souls around pester me “Its only lame excuses you make”

But nine o five crappy shit is really not my piece of cake

As per Darwin’s theory must have been extinct as of now

May be an exceptional case managed to drag somehow

But still I do promise my life it will be a fun ride

With all the adventures and madness amplified

जरुरत


दिल ने पुछा चाहत से क्यों तू दूर
उसने कहा, रुह,बेडी है पैरों की
इस जहाँ में उलझन है गैरों की
ये जिस्मो का बाजार है
ना कोई एहसासों का खरीददार
हमने भी दिल का सौदा किया एक दफा
बरबाद हम ही हुए,ठहरे हम ही बेवफा
अब ना इश्क की हवा छूती
ना गम की आंधी बेहती
ना वक्त जाया होता है
ना खामोशी छूबती है
अब बस एक से दामन छुटा
तो दुसरे पेहलू में जा बैठा
ना खुद्द की तौहिन,ना खुद्द को सजा
बस जरुरत बदल ली और जिने कि वजह

नादान दिल


ना कोई रंजिशे,ना कोई साजिशे
इस दुखे हुए दिल की बस है कुछ ख्वाईशे
कुछ अपनों के लिए,कुछ टूटे सपनों के लिए
कुछ भटके मुसाफिरों के लिए,कुछ सेहमें परिंदो के लिए
ना जाने अब तक क्या हासील करने धडक रहा है ये
बेवजह औरो की तरह जिने की जिद्द में,
मौत को बेबस लौटा रहा है ये

रास ना आई दुनिया की सजाई मेहफिल
उसकी चकाचौंद और जश्न के न थे कभी हम काबिल
कभी होश में न थे समजदारी की किताब पढ़ने के लिए
अपनी किताब का तो हर पन्ना था बेफिकीरी में ढलने के लिए
रोज दिल को फुसलाते रहे ये कहके इस काफिले के नहीं है हम
वो डरता रहा नादान कि कही जमाने की इस दौड में पीछे ना रह जाए हम

गल्लत


कधी कधी विचारंचा आणि शब्दांचा गोंधळ होतो
म्हणून मग मनाचा कवितेशी कलह होतो
धुमसणार मन सारं ओकू पाहत
पण समाजाचं भान राखून काव्य त्याला रोकू पाहत
प्रतेकाविषयी असलेल्या रागाचा निखारा धगधगत राहतो
पण शब्दांमध्ये तो वितळलेल्या मेणासारखा मऊ होऊन जातो
इथेच तर खरी फसगत होते
मन वेगळंच बोलू पाहत पण शब्दात मांडताना गल्लत होते